Monday, June 11, 2018

क्या इक दरिया अपना पानी चुन सकता है

क्या इक दरिया अपना पानी चुन सकता है
पानी भी क्या अपनी रवानी चुन सकता है

जीना है दुनिया में दुनिया की शर्तों पर
कौन क़फ़स में दाना-पानी चुन सकता है

(क़फ़स = पिंजरा)

दिल तो वो दीवाना है जो मह़फ़िल में भी
अपनी मर्ज़ी की वीरानी चुन सकता है

छोड़ दिया है मैंने दर-दर सजदा करना
तू कोई दीगर पेशानी चुन सकता है

मैंने तो ख़त में लिक्खे हैं अपने मआ’नी
वो इस ख़त में अपने मआ’नी चुन सकता है

जीना ही जब इतना मुश्किल है तो कोई
कैसे मरने की आसानी चुन सकता है

हर किरदार को चुन लेती है उसकी कहानी
क्या कोई किरदार कहानी चुन सकता है

- राजेश रेड्डी

Thursday, June 7, 2018

फिर न मन में कभी मलाल आया

फिर न मन में कभी मलाल आया
नेकियाँ जब कुएँ में डाल आया।

होड़ सी लग रही थी जाने क्यूँ
मैं तो सिक्का वहाँ उछाल आया।

आज हम भी जवाब दे बैठे
बज़्म में फिर बड़ा उबाल आया।

फ़न की बारीकियाँ समझने का
उम्र के बाद ये कमाल आया।

फेर लीं आपने निगाहें जब
आज दिल में बड़ा मलाल आया।

इक ज़माने से ख़ुद परेशाँ थे
आज तबियत में कुछ उछाल आया।

'आरसी' झूठ जब नहीं बोला
आइने में कहाँ से बाल आया।

-आर. सी. शर्मा “आरसी”

Friday, March 30, 2018

मुस्कुराओ बहार के दिन हैं
गुल खिलाओ बहार के दिन हैं
-साग़र सिद्दीक़ी

Monday, March 19, 2018

नहीं ! ऐसा नहीं है हम सभी को भूल जाते हैं

नहीं ! ऐसा नहीं है हम सभी को भूल जाते हैं
हमें जो भूल जाता है , उसी को भूल जाते हैं

सभी को याद रखना भी कभी मुमकिन नहीं होता
किसी को याद रखते हैं, किसी को भूल जाते हैं

कुछ ऐसे लोग हैं जिन को भुला देने की कोशिश में
कभी ख़ुद को कभी हम ज़िन्दगी को भूल जाते हैं

हमें औरों की खामी तो हमेशा याद रहती है
बुरा ये हैं कि हम अपनी कमी को भूल जाते हैं

हमारी बेसबब गहरी उदासी का सबब ये है
कि हम ग़म याद रखते हैं ख़ुशी को भूल जाते हैं

चमकती शाहराहों में कशिश ऐसी है कुछ आलम
कि लोग अपना नगर, अपनी गली को भूल जाते हैं

-आलम खुर्शीद

Sunday, March 18, 2018

नव वर्ष के दोहेे

अब खूँटी पर टाँग दे, नफ़रत-भरी कमीज़ ।
बोना है नव वर्ष में, मुस्कानों के बीज ।।

घर में या परदेस में ,सबसे मुझको प्यार ।
सबके आँगन में खिले, फूलों का संसार ।।

नए साल से हम कहें-करलो दुआ कुबूल ।
माफ़ करें हर एक की, जो-जो खटकी भूल ।।

मुड़-मुड़कर क्या देखना, पीछे उड़ती धूल ।
फूलों की खेती करो, हट जाएँगे शूल ।।

अधरों पर मुस्कान ले, कहता है नव वर्ष ।
छोड़ उदासी को यहाँ, आ पहुँचा है हर्ष ।।

-रामेश्वर काम्बोज हिमांशु