Thursday, June 22, 2017

दर्द की इन्तेहाँ हो गई

दर्द की इन्तेहाँ हो गई
आह भी बेज़ुबां हो गई

हाथ ना आ सकी उम्र भर
हर ख़ुशी आसमां हो गई

ऐ सुकूं बस तेरी चाह में
ज़िन्दगी रायगाँ हो गई

 (रायगाँ = व्यर्थ)

बाद मुद्दत के जब वो मिले
फिर मुहब्बत जवां हो गईं

मुस्कुराते रहे लब मगर
आँख आबे रवां हो गई

 (आबे रवां = बहता पानी)

छुप सकी ना हकीकत कभी
चेहरे से अयां हो गई

 (अयां = प्रकट)

जिस्म जलता रहा उम्र भर
रूह जो थी धुआं हो गई

सांस बस मुस्कुराती रही
ज़िन्दगी बदगुमां हो गई

लफ्ज़ यूं गुम हुए हैं मेरे
अनकही दास्तां हो गई

- विकास

Thursday, April 20, 2017

गुज़रता है मेरा हर दिन मगर पूरा नहीं होता

गुज़रता है मेरा हर दिन मगर पूरा नहीं होता
मैं चलता जा रहा हूँ और सफ़र पूरा नहीं होता

लगाना बाग़ तो उसमें मुहब्बत भी ज़रा रखना
परिंदों के बिना कोई शजर पूरा नहीं होता

(शजर = पेड़)

ख़ुदा भी ख़ूब है भगवान की मूरत भी सुन्दर है
मगर जब माँ नहीं होती तो घर पूरा नहीं होता

वो चोटी की बनावट हो कि टोपी की सजावट हो
बिना इन्सानियत के कोई सर पूरा नहीं होता

ये मेरा ख़ालीपन है जो मुझे सैराब करता है
उधर रहता हूँ मैं ख़ुद में जिधर पूरा नहीं होता

(सेराब = भरपूर, भरा हुआ, भीगा हुआ, पानी से सींचा हुआ)

-शकील आज़मी

Friday, April 14, 2017

आदम की किसी रूप में तहक़ीर न करना
फिरता है ज़माने में ख़ुदा भेस बदल कर
-नामालूम

(तहक़ीर = अपमान, निरादर)

Thursday, April 13, 2017

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा

कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा

तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा
घर में घिर जाऊँगा सहरा में बिखर जाऊँगा

(सहरा = रेगिस्तान, जंगल, बयाबान, वीराना, विस्तार)

तेरे पहलू से जो उठ्ठूँगा तो मुश्किल ये है
सिर्फ़ इक शख़्स को पाऊँगा जिधर जाऊँगा

अब तिरे शहर में आऊँगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊँगा

(साया-ए-अब्र = बादल की परछाई)

तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वर्ना सोचा था कि जब चाहूँगा मर जाऊँगा

चारासाज़ों से अलग है मिरा मेआर कि मैं
ज़ख़्म खाऊँगा तो कुछ और सँवर जाऊँगा

(चारासाज़ों = चिकित्सकों), (मेआर = मानदंड)

अब तो ख़ुर्शीद को गुज़रे हुए सदियाँ गुज़रीं
अब उसे ढूँढने मैं ता-ब-सहर जाऊँगा

(ख़ुर्शीद = सूरज), (ता-ब-सहर = सुबह तक)

ज़िंदगी शम्अ' की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुब्ह तो कर जाऊँगा

-अहमद नदीम क़ासमी

Friday, April 7, 2017

सज़ा दो अगरचे गुनहगार हूँ मैं

सज़ा दो अगरचे गुनहगार हूँ मैं
यूं सर भी कटाने को तैयार हूँ मैं।

ये दुनिया समझती है पत्थर मुझे क्यूं
ज़रा गौर कर प्यार ही प्यार हूँ मैं।

गुज़ारा है टूटे खिलौनों में बचपन
यूं बच्चों का अपने गुनहगार हूँ मैं।

सुलह चाहता हूँ सभी से यहां मैं
गिरा दो जो लगता है दीवार हूँ मैं।

बदलता नहीं वक़्त के साथ हरगिज़
चलो आज़मा लो वही यार हूँ मैं।

हुनर कश्तियों का नहीं है ये माना
भरोसा तो कर लो के पतवार हूँ मैं।

रहा मुंतज़िर मैं गुलों का हमेशा
समझते हो जो खार तो खार हूँ मैं।

(मुंतज़िर = प्रतीक्षारत), (गुल = फूल), (खार = कांटे)

- विकास