Wednesday, August 1, 2018

तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ
-शाद अज़ीमाबादी

Tuesday, July 31, 2018

ख़ुश्क पत्ता ही सही, रौंद के आगे ना बढ़ो
मैं गई रुत की निशानी हूँ, उठालो मुझको
-नौबहार सिंह "साबिर"

Wednesday, July 25, 2018

निकले अगर तो पहुँचे इक पल में ला-मकाँ तक

निकले अगर तो पहुँचे इक पल में ला-मकाँ तक
कुछ बात है कि नाला आता नहीं ज़ुबाँ तक

जब शहर ए दोस्ताँ ही समझे नहीं ज़ुबाँ तक
फाड़ें गला हम अपना बे फ़ायदा कहाँ तक

आख़िर को नीम जां का क़िस्सा तमाम शुद है
मुज़दा ये ले के जाओ तुम मेरे मेहरबाँ तक

दिल अपना खिल न पाया बाद अज़ ख़िज़ां भी क्यूंकर
वैसे बहार आई तो होगी गुलसिताँ तक

आ तो गए हैं याँ तकजाएँ किधर को यारब
नक़्श ए क़दम का हम कुछ पाते नहीं निशाँ तक

पूछे जो नाम उनकाबाबरतो क्या कहें हम
ऐसा छुपा है दिल में आता नहीं ज़ुबाँ तक

-बाबर इमाम

वहशत, आह, फ़ुग़ाँँ और गिरया...शोर मचा है नालों का


वहशत, आह, फ़ुग़ाँँ और गिरया...शोर मचा है नालों का
बस्ती में बाज़ार लगा है चाक गिरेबाँ वालों का

खेल सियानों का है मुहब्बत, इस का छल तुम क्या जानो
क्या बतलाएँ क्या होता है इस में भोले भालों का

चल कर खुद ही देख ले सारे जीते हैं या मरते हैं
जान गई, पर जी अटका है, तेरे ख़स्ता हालों का

तेरे सर के सौदे की तशहीर है सारी बस्ती में
किस पर भेद छुपा है, पगले, उलझे सुलझे बालों का

लाख उपायों से न टली है बिपता जो कि आनी थी
तदबीर से पलड़ा भारी है, तक़दीर की उलटी चालों का

ख़ार ए बयाबाँ के बोसे से जबकि चारा हो जाए
गुल से मुँह का लगाना कैसा अपने पाँव के छालों का

जितना ज़ोर लगाया उतना उलझा उसकी कुंडली में
पल पल कसता जाए दिल पर हल्क़ा काले बालों का

एक तसव्वुर के पर्दे में, बाबर, माज़ी, फ़र्दा, हाल
आँखें मूँदे सफ़र किया है जाने कितने सालों का

-बाबर इमाम

Friday, July 20, 2018

जितना कम सामान रहेगा

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उस से मिलना ना-मुम्किन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं
मुश्किल में इंसान रहेगा

'नीरज' तो कल यहाँ न होगा
उस का गीत विधान रहेगा

-गोपालदास नीरज