Tuesday, October 16, 2018

हरा शजर न सही ख़ुश्क घास रहने दे

हरा शजर न सही ख़ुश्क घास रहने दे
ज़मीं के जिस्म पे कोई लिबास रहने दे

(शजर = पेड़, वृक्ष), (ख़ुश्क घास = सूखी घास)

कहीं न राह में सूरज का क़हर टूट पड़े
तू अपनी याद मिरे आस-पास रहने दे

तसव्वुरात के लम्हों की क़द्र कर प्यारे
ज़रा सी देर तो ख़ुद को उदास रहने दे

(तसव्वुर = ख़याल, विचार, याद)

-सुल्तान अख़्तर

Thursday, September 13, 2018

शाखें रहीं तो फूल भी, पत्ते भी आएँगे
ये दिन अगर बुरे हैं, तो अच्छे भी आएँगे
-"मंज़ूर" हाशमी

Wednesday, August 1, 2018

तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ
-शाद अज़ीमाबादी

Tuesday, July 31, 2018

ख़ुश्क पत्ता ही सही, रौंद के आगे ना बढ़ो
मैं गई रुत की निशानी हूँ, उठालो मुझको
-नौबहार सिंह "साबिर"

Wednesday, July 25, 2018

निकले अगर तो पहुँचे इक पल में ला-मकाँ तक

निकले अगर तो पहुँचे इक पल में ला-मकाँ तक
कुछ बात है कि नाला आता नहीं ज़ुबाँ तक

जब शहर ए दोस्ताँ ही समझे नहीं ज़ुबाँ तक
फाड़ें गला हम अपना बे फ़ायदा कहाँ तक

आख़िर को नीम जां का क़िस्सा तमाम शुद है
मुज़दा ये ले के जाओ तुम मेरे मेहरबाँ तक

दिल अपना खिल न पाया बाद अज़ ख़िज़ां भी क्यूंकर
वैसे बहार आई तो होगी गुलसिताँ तक

आ तो गए हैं याँ तकजाएँ किधर को यारब
नक़्श ए क़दम का हम कुछ पाते नहीं निशाँ तक

पूछे जो नाम उनकाबाबरतो क्या कहें हम
ऐसा छुपा है दिल में आता नहीं ज़ुबाँ तक

-बाबर इमाम