Tuesday, March 28, 2017

हुआ है तुझ से बिछड़ने के बाद ये मालूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
-अहमद फ़राज़

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे
किस को सैराब करे वो किसे प्यासा रक्खे

(सहरा = रेगिस्तान),  (सैराब = भरपूर, भरा हुआ)

उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
ऐ मिरी जान के दुश्मन, तुझे अल्लाह रक्खे

हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे

(वाबस्ता =  सम्बन्धित, सम्बद्ध, बंधा हुआ)

कम नहीं तमअ-ए-इबादत भी तो हिर्स-ए-ज़र से
फ़क़्र तो वो है कि जो दीन न दुनिया रक्खे

(तमअ-ए-इबादत = झूठी प्रार्थना), (हिर्स-ए-ज़र = पैसे का लालच), (फ़क़्र = साधुता, दरवेशी)

हँस न इतना भी फ़क़ीरों के अकेले-पन पर
जा ख़ुदा मेरी तरह तुझ को भी तन्हा रक्खे

ये क़नाअत है, इताअत है, कि चाहत है 'फ़राज़'
हम तो राज़ी हैं वो जिस हाल में जैसा रक्खे

(क़नाअत = सन्तोष), (इताअत = हुक्म मानना, आज्ञापालन)

-अहमद फ़राज़
अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
-अहमद फ़राज़

(अना = अहम, अहंकार, आत्मसम्मान)

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम

(मरासिम = मेल-जोल, प्रेम-व्यवहार)

सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम

(सहरा-ए-ज़िंदगी = ज़िन्दगी के रेगिस्तान), (सदाएँ = आवाज़)

इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम

(फ़राग़त = अवकाश, सुख, आराम, चैन)

तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम

( दिल-ज़दा = जिसका दिल घायल हो, दुखित), (शब-ए-फ़िराक़ = जुदाई की रात)

वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल 'फ़राज़'
है है ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

(ख़ुदा-न-कर्दा = ख़ुदा न करे)

-अहमद फ़राज़

कितने भूले हुए नग़्मात सुनाने आए

कितने भूले हुए नग़्मात सुनाने आए
फिर तिरे ख़्वाब मुझे मुझ से चुराने आए

फिर धनक-रंग तमन्नाओं ने घेरा मुझ को
फिर तिरे ख़त मुझे दीवाना बनाने आए

(धनक-रंग = इंद्रधनुष के रंग)

फिर तिरी याद में आँखें हुईं शबनम शबनम
फिर वही नींद न आने के ज़माने आए

फिर तिरा ज़िक्र किया बाद-ए-सबा ने मुझ से
फिर मिरे दिल को धड़कने के बहाने आए

(बाद-ए-सबा = पूर्व से आने वाली हवा, पुरवाई)

फिर मिरे कासा-ए-ख़ाली का मुक़द्दर जागा
फिर मिरे हाथ मोहब्बत के ख़ज़ाने आए

(कासा-ए-ख़ाली = ख़ाली भिक्षापात्र)

शर्त सैलाब समोने की लगा रक्खी थी
और दो अश्क भी हम से न छुपाने आए

(सैलाब समोने = तूफ़ान को सोखना/ समेटना)

-इक़बाल अशहर