Sunday, January 7, 2018

आते आते इश्क़ करने का हुनर आ जायेगा
रफ़्ता रफ़्ता ज़िन्दगी आसान होती जायेगी

सोच लो ये दिल्लगी भारी न पड़ जाए तुम्हें
जान जिसको कह रहे हो जान होती जायेगी

-अमीर इमाम 

Sunday, December 31, 2017

देखो तो हर इक रंग से मिलता है मेरा रंग
सोचो तो हर इक बात है औरों से जुदा भी

यूँ तो मेरे हालात से वाक़िफ़ है ज़माना
लेकिन मुझे मिलता नहीं कुछ अपना पता भी
-अतहर नादिर

Monday, December 11, 2017

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े

(फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ = नीची और ऊँची जगहों की चिंता)

साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े

(ग़म-ए-तिश्ना-लबी = प्यासे होठों का दुःख)

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह   
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

-कैफ़ी आज़मी
         


Ustad Munnawar Ali Khan
Begum Akhtar 

बात ज्यों कि त्यों खड़ी है क्या कहें, किससे कहें

बात ज्यों कि त्यों खड़ी है क्या कहें, किससे कहें
सबको बस अपनी पड़ी है, क्या कहें,किससे कहें

है तकाज़ा संतुलन का पर यहाँ तो हर जगह
आरज़ू कद से बड़ी है,क्या कहें, किससे कहें

अपशकुन आरंभ ही में हो गया है दोस्तों
बाकि पूरी इक लड़ी है क्या कहें, किससे कहें

प्यार का इक फूल था पर पास अपने अब फ़क़त
एक सूखी पंखुड़ी है, क्या कहें, किससे कहें

मुद्दतों से पक्ष दोनों मन से तो तैयार हैं
बस पहल पर ही अड़ी है, क्या कहें, किससे कहें

कूप तो पानी को तरसें और दरियाओं में रोज
मेघ कि लगती झड़ी है,क्या कहें, किससे कहें

- हस्तीमल हस्ती
एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में
बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

(बज़्म = महफ़िल)