Friday, November 17, 2017

ज़िंदा रहना है तो ख़ुद को मिटाना सीखो
घुट के मरते हैं सदा जान बचाने वाले
-"माजिद" देवबंदी

Sunday, October 1, 2017

सच के हक़ में खड़ा हुआ जाए

सच के हक़ में खड़ा हुआ जाए
जुर्म भी है तो ये किया जाए

हर मुसाफ़िर में ये शऊर कहाँ
कब रुका जाए कब चला जाए

हर क़दम पर है गुमराही
किस तरफ़ मेरा काफ़िला जाए

बात करने से बात बनती है
कुछ कहा जाए कुछ सुना जाए

राह मिल जाए हर मुसाफ़िर को
मेरी गुमराही काम आ जाए

इसकी तह में हैं कितनी आवाजें
ख़ामोशी को कभी सुना जाए

-हस्तीमल 'हस्ती'

Saturday, September 30, 2017

ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या

ये दिल कुटिया है संतों की यहाँ राजा भिकारी क्या
वो हर दीदार में ज़रदार है गोटा किनारी क्या

ये काटे से नहीं कटते ये बांटे से नहीं बंटते
नदी के पानियों के सामने आरी कटारी क्या

उसी के चलने-फिरने, हंसने-रोने की हैं तस्वीरें
घटा क्या, चाँद क्या, संगीत क्या, बाद-ए-बहारी क्या

किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या

हमारा मीर जी से मुत्तफ़िक़ होना है नामुमकिन
उठाना है जो पत्थर इश्क़ का तो हल्का-भारी क्या

-निदा फ़ाज़ली

https://www.youtube.com/watch?v=m60cNdXCsT4

Thursday, August 17, 2017

हम सहल-तलब कौन से फ़रहाद थे लेकिन
अब शहर में तेरे कोई हम सा भी कहाँ है
-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

(सहल-तलब = आराम-तलब)

ख़ुद को इतना जो हवा-दार समझ रक्खा है

ख़ुद को इतना जो हवा-दार समझ रक्खा है
क्या हमें रेत की दीवार समझ रक्खा है

हम ने किरदार को कपड़ों की तरह पहना है
तुम ने कपड़ों ही को किरदार समझ रक्खा है

मेरी संजीदा तबीअत पे भी शक है सब को
बाज़ लोगों ने तो बीमार समझ रक्खा है

उस को ख़ुद-दारी का क्या पाठ पढ़ाया जाए
भीक को जिस ने पुरुस-कार समझ रक्खा है

तू किसी दिन कहीं बे-मौत न मारा जाए
तू ने यारों को मदद-गार समझ रक्खा है

-हसीब सोज़