Friday, February 15, 2013

तुमसे अपना रब्त पुराना ग़म से गहरी यारी है,
जितने भी हैं जान के दुश्मन सब से रिश्तेदारी है।

(रब्त = सम्बन्ध, मेल)

-ज़फ़र गोरखपुरी

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