वह समुन्दर है तो फिर रूह को शादाब करे,
तश्नगी क्यों मुझे देता है सराबों की तरह ।
-परवीन शाकिर
[(शादाब = प्रफुल्लित), (तश्नगी = प्यास), (सराब = मृगतृष्णा)]
तश्नगी क्यों मुझे देता है सराबों की तरह ।
-परवीन शाकिर
[(शादाब = प्रफुल्लित), (तश्नगी = प्यास), (सराब = मृगतृष्णा)]
गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह , दिल पे उतरेंगे वही ख़्वाब अज़ाबों की तरह ..
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