Saturday, February 16, 2013

वह समुन्दर है तो फिर रूह को शादाब करे,
तश्नगी क्यों मुझे देता है सराबों की तरह ।
-परवीन शाकिर

[(शादाब = प्रफुल्लित), (तश्नगी = प्यास), (सराब = मृगतृष्णा)]

1 comment:

  1. गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह , दिल पे उतरेंगे वही ख़्वाब अज़ाबों की तरह ..

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