Friday, February 15, 2013

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज़े-बयाँ और।

(सुखनवर  = कवी, शायर)

-मिर्ज़ा ग़ालिब

बल्लीमारां के मोहल्लों की वो पेचीदा दलीलों की-सी गलियाँ
सामने टाल के नुक्कड़ पे, बटेरों के कसीदे
गुड़गुड़ाती  हुई पान की पीकों में वह दाद , वह वाह्-वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा-से कुछ टाट के परदे
एक बकरी के मिमयाने की आवाज़
और धुंधलाई हुई शाम के बेनूर अंधेरे
ऐसे दीवारों से मुँह जोड़ के चलते है यहाँ
चूड़ीवालान के कटरे की ' बड़ी बी ' के जैसे
अपनी बुझती हुई आँखों से दरवाज़े टटोले
इसी बेनूर अंधेरी-सी गली क़ासिम से
एक तरतीब चरागों की शुरु होती है
एक कुरान-ए-सुख़न का सफ़ा खुलता है
असद उल्लाह खाँ ग़ालिब का पता मिलता है
-गुलज़ार



हर एक बात पे कहते हो तुम, कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगु क्या है

(अंदाज़-ए-गुफ़्तगु = बात-चीत का तरीका, वार्ताशैली)

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई  बताओ, कि वो शोखः-ए-तुंद ख़ू  क्या  है

[(बर्क़ = बिजली), (शोखः-ए-तुंद ख़ू = तेज स्वभाव वाला माशूक)]

यह रश्क  है कि वो होता है हम-सुख़न तुमसे
वगरना   ख़ौफ-ए-बद-आमोज़ि-ए-अदू   क्या  है

[(रश्क = ईर्ष्या), (हम-सुख़न = समान भाषी), (ख़ौफ-ए-बद-आमोज़ि-ए-अदू  = शत्रु के सिखाने बुझाने का डर)

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी  जैब को अब  हाजत-ए-रफ़ू  क्या है

[(पैराहन = वस्त्र), (जैब = गरेबान, कुरते की कंठी), (हाजत-ए-रफ़ू = रफ़ू की ज़रुरत)]

जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते  हो जो अब  राख,  जुस्तजू क्या  है

(जुस्तजू = तलाश, खोज)

रगों में  दौड्ते फिरने  के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है

वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाय बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है

[(अज़ीज़ = प्रिय), (बहिश्त = स्वर्ग), (बादा-ए-गुलफ़ाम-ए-मुश्कबू = कस्तूरी की तरह सुगंधित और फूल की तरह रंगीन मदिरा)]

पियूं शराब अगर ख़ुम भी देख लूं दो चार
यह   शीशा-ओ-कदः-ओ-कूज़ा-ओ-सूबू   क्या  है

[(ख़ुम = मधुघट), (शीशा-ओ-कदः-ओ-कूज़ा-ओ-सूबू = बोतल, प्याला, मधुपात्र और मधुकलश)]

रही ना ताक़त-ए-गुफ़्तार, और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे  कहिए के आरज़ू  क्या है

 [ताक़त-ए-गुफ़्तार = बोलने की शक्ति]

हुआ  है  शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगरना शहर में ग़ालिब' की आबरू क्या है

[(मुसाहिब = सभासद), (आबरू = इज़्ज़त, प्रतिष्ठा, सम्मान)]

-मिर्ज़ा ग़ालिब

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