Sunday, February 17, 2013

हर एक ग़म निचोड़ के, हर एक रस जिये

हर एक ग़म निचोड़ के, हर एक रस जिये
दो दिन की ज़िन्दगी में हज़ारों बरस जिये

सदियों पे अख़्तियार नहीं था हमारा दोस्त
दो चार लम्हे बस में थे, दो चार बस जिये

(अख़्तियार = इख़्तियार = अधिकार, स्वामित्व, प्रभुत्व)

सहरा के उस तरफ़ से गये सारे कारवाँ
सुन-सुन के हम तो सिर्फ़ सदा-ए-जरस जिये

(सहरा = विस्तार, जंगल, रेगिस्तान), (सदा-ए-जरस =घंटा/ घड़ियाल, जो यात्रियों के साथ रहता है, की आवाज़)

होंठों में ले के रात के आँचल का इक सिरा
आँखों पे रख के चाँद के होंठों का मस जिये

(मस = स्पर्श)

महदूद हैं दुआएँ मेरे अख़्तियार में
हर साँस हो सुकून की तू सौ बरस जिये

(महदूद = जिसकी हद बाँध दी गई हो, सीमित)

-गुलज़ार

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