Saturday, June 15, 2013

जीवन के दुश्वार सफ़र में बे-मौसम बरसातें सच,
उसने कैसे काटी होंगी, लम्बी - लम्बी रातें सच।

लफ़्ज़ों की दुनियादारी में आँखों की सच्चाई क्या ?
मेरे सच्चे मोती झूठे, उसकी झूटी बातें सच।

कच्चे-रिश्ते, बासी-चाहत और अधूरा-अपनापन,
मेरे हिस्से में आई हैं ऐसी ही सौग़ातें सच।

जाने क्यों मेरी नींदों के हाथ नहीं पीले होते,
पलकों से ही लौट गई हैं सपनों की बारातें सच।

धोखा ख़ूब दिया है ख़ुद को झूठे-मूठे क़िस्सों से,
याद मगर जब करने बैठे, याद आईं हैं बातें सच।
-आलोक श्रीवास्तव

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