जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है
एक समंदर मेरी आँखों से बहा करता है
उस की बातें मुझे खुशबू की तरह लगती हैं
फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है
मेरे दोस्त की पहचान यही काफी है
वो हर एक शख़्स को दानिस्ता ख़फ़ा करता है
(दानिस्ता = जान-बूझकर)
है और तो कोई सबब उस की मुहब्बत का नहीं
बात इतनी है के वो मुझ से जफ़ा करता है
जब खिज़ा आई तो लौट आयेगा वो भी 'फ़राज़'
वो बहारों में ज़रा कम मिला करता है
-अहमद फ़राज़
एक समंदर मेरी आँखों से बहा करता है
उस की बातें मुझे खुशबू की तरह लगती हैं
फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है
मेरे दोस्त की पहचान यही काफी है
वो हर एक शख़्स को दानिस्ता ख़फ़ा करता है
(दानिस्ता = जान-बूझकर)
है और तो कोई सबब उस की मुहब्बत का नहीं
बात इतनी है के वो मुझ से जफ़ा करता है
जब खिज़ा आई तो लौट आयेगा वो भी 'फ़राज़'
वो बहारों में ज़रा कम मिला करता है
-अहमद फ़राज़
No comments:
Post a Comment