Tuesday, June 18, 2013

जब तेरा दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है
एक समंदर मेरी आँखों से बहा करता है

उस की बातें मुझे खुशबू की तरह लगती हैं
फूल जैसे कोई सहरा में खिला करता है

मेरे दोस्त की पहचान यही काफी है
वो हर एक शख़्स  को दानिस्ता ख़फ़ा करता है

(दानिस्ता = जान-बूझकर)

है और तो कोई सबब उस की मुहब्बत का नहीं
बात इतनी है के वो मुझ से जफ़ा करता है

जब खिज़ा आई तो लौट आयेगा वो भी 'फ़राज़'
वो बहारों में ज़रा कम मिला करता है
-अहमद फ़राज़

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