Saturday, August 6, 2016

मुद्दतों बाद घर में बहार आई है

मुद्दतों बाद घर में बहार आई है
सबको इक इक की याद आई है

किसने छींटे दिये देखो पानी के
खिल उठी आँगन की चारपाई है

एक कोने में धूल खाते रेडियो ने
आज वही पुरानी धुन बजाई है

वो महुए का पेड़ कितना उदास था
फिर भीनी सी खुशबू बिखर आई है

कच्चे शरीफों को गेंद बना कर खेलें
क्यूँकर तबीयत आज मचल आई है

चलो छत पे मिल के पतंग उड़ाते हैं
बाबा ने सहेज के रखी वो लटाई है

आज घर की रसोई फिर महकी है
शायद अम्मा ने वही खीर बनाई है

माह-ओ-साल नहीं दो चार बरस में
आओ प्यारे यही घर की रंगाई है

अब उम्र की नकदी ख़त्म होने को
अब कैसी, किससे, कोई रुसवाई है

-स्मृति रॉय 

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