Friday, April 5, 2019

इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो
मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो
-नरेश कुमार शाद

(दिल-ए-कम-नज़र = संकीर्ण दृष्टि वाला दिल), (शाम-ए-अलम = दुःख की शाम)

No comments:

Post a Comment