इक नया अंदाज़ दे शायद हमें
ज़िन्दगी आवाज़ दे शायद हमें।
सच को सच कहते रहे हम उम्र भर
अब कोई एज़ाज़ दे शायद हमें।
(एज़ाज़ = इज़्ज़त/प्रतिष्ठा)
अब तलक तो रूठ कर बैठी है पर
ज़िन्दगी परवाज़ दे शायद हमें।
(परवाज़ = उड़ान)
लफ़्ज़ कम हैं लबकुशाई के लिए
अब ग़ज़ल अल्फ़ाज़ दे शायद हमें।
(लबकुशा = बात करना)
हम खड़े हैं मोड़ पर उम्मीद से
फिर कोई आवाज़ दे शायद हमें।
- विकास वाहिद।। ०५-०४-१९
ज़िन्दगी आवाज़ दे शायद हमें।
सच को सच कहते रहे हम उम्र भर
अब कोई एज़ाज़ दे शायद हमें।
(एज़ाज़ = इज़्ज़त/प्रतिष्ठा)
अब तलक तो रूठ कर बैठी है पर
ज़िन्दगी परवाज़ दे शायद हमें।
(परवाज़ = उड़ान)
लफ़्ज़ कम हैं लबकुशाई के लिए
अब ग़ज़ल अल्फ़ाज़ दे शायद हमें।
(लबकुशा = बात करना)
हम खड़े हैं मोड़ पर उम्मीद से
फिर कोई आवाज़ दे शायद हमें।
- विकास वाहिद।। ०५-०४-१९
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