Tuesday, February 12, 2013

आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था

आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था
आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था
आता न था नज़र को नज़र का क़ुसूर था

कोई तो दर्दमंद-ए-दिले-नासुबूर था
माना कि तुम न थे, कोई तुम-सा ज़रूर था

(दर्दमंद-ए-दिले-नासुबूर = अधीर हृदय का हितैषी)

लगते ही ठेस टूट गया साज़-ए-आरज़ू
मिलते ही आँख शीशा-ए-दिल चूर-चूर था

(साज़-ए-आरज़ू = अभिलाषा रूपी वाद्य यंत्र)

ऐसा कहाँ बहार में रंगीनियों का जोश
शामिल किसी का ख़ून-ए-तमन्ना ज़रूर था

(ख़ून-ए-तमन्ना = आकांक्षा/ इच्छा का ख़ून)

साक़ी की चश्मे-मस्त का क्या कीजिए बयान
इतना सुरूर था कि मुझे भी सुरूर था

जिस दिल को तुमने लुत्फ़ से अपना बना लिया
उस दिल में इक छुपा हुआ नश्तर ज़रूर था

देखा था कल ‘जिगर’ को सरे-राहे-मैकदा
इस दर्ज़ा पी गया था कि नश्शे में चूर था

(सरे-राहे-मैकदा = मधुशाला के रास्ते में)

-जिगर मुरादाबादी


No comments:

Post a Comment