Friday, February 8, 2013

अँधेरे को उजाले का सुबह को रात का डर है,
जिन्होंने मूंद ली आखें उन्हें किस बात का डर है ?

बहुत सच बोलता है ये इसे जल्दी ज़हर दे दो,
सियासत को ज़माने में फ़क़त सुकरात का डर है।
-शायर: नामालूम

 

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