Friday, June 3, 2016

पारा-पारा हुआ पैराहन-ए-जाँ

पारा-पारा हुआ पैराहन-ए-जाँ
फिर मुझे छोड़ गये चारागराँ

(पारा-पारा = टुकड़े-टुकड़े), (पैराहन-ए-जाँ = प्राणों का लिबास, शरीर), (चारागराँ = चिकित्सक)

कोई आहट, न इशारा, न सराब
कैसा वीराँ है ये दश्त-ए-इम्काँ

(सराब = मृगतृष्णा), (वीराँ = वीरान), (दश्त-ए-इम्काँ = संभावनाओं का जंगल, सम्भावना क्षेत्र, संसार)

चारसू ख़ाक़ उड़ाती है हवा,
अज़कराँ ताबाकराँ रेग-ए-रवाँ

(चारसू = चारों ओर, हर समय), (अज़कराँ = प्रभुत्व स्थापित करना), (ताबाकराँ = चमकदार), (रेग-ए-रवाँ = उड़ता हुआ बालू या रेत)

वक़्त के सोग में लम्हों का जुलूस
जैसे इक क़ाफ़िला-ए-नौहागराँ

(सोग = शोक), (क़ाफ़िला-ए-नौहागराँ = शोक मनाने वालों का कारवां)

मर्ग-ए-उम्मीद के वीराँ शब-ओ-रोज़
मौसम-ए-दहर, बहार और न ख़िज़ाँ

(मर्ग-ए-उम्मीद = आशाओं की मौत), (वीराँ = वीरान), (शब-ओ-रोज़ = रात और दिन), (मौसम-ए-दहर = दुनिया का मौसम), (ख़िज़ाँ = पतझड़)

कैसे घबराये हुए फिरते हैं
तेरे मोहताज़ तेरे दिल-ज़दगाँ

(दिल-ज़दगाँ = दिल की चोट खाये हुए)

-सय्यद रज़ी तिरमिज़ी


Ghulam Ali/ ग़ुलाम अली
https://youtu.be/p7_zp7NdQOA




1 comment: