Thursday, April 7, 2016

मैं कौन हूँ

पूछो अपने से -
मैं कौन हूँ  -
शरीर ?
न-न, यह नहीं हो सकता ।
अनवरत रूप से परिवर्तित हो रहा है यह ।
पिछले वर्ष जो मेरा शरीर था वह इस वर्ष नहीं है ।
जब बालक था मैं
तब मेरा शरीर वह नहीं था,
जो अब है ।
मेरा शरीर लगातार परिवर्तित हो रहा है
यह मेरा आंतरिक स्वभाव नहीं है ।
 
क्या मैं अपना मन हूँ ?
नहीं, मेरा आंतरिक स्वभाव मन नहीं हो सकता ।
क्योंकि यह भी लगातार बदल रहा है ।
एक क्षण यह रुष्ट हो जाता है,
दूसरे क्षण तुष्ट हो जाता है ।
मनःस्थितियाँ प्रति क्षण बदलती रहती हैं ।
मन भी मेरा वास्तविक स्वाभाव नहीं हो सकता ।

क्या मैं हिन्दू हूँ ? या मुसलमान ? या ईसाई ?
नहीं ये तो अधूरा परिचय देते हैं मेरा ।
इनको मेरे आंतरिक स्वभाव से कोई लेना-देना नहीं ।   

सतत् अपने से यह प्रश्न पूछो -
कौन हूँ मैं ?
मैं साक्षी हूँ ।
वैश्व-दृश्य प्रपंचों का साक्षी ।
मैं सत्ता हूँ -
अपरिवर्तनीय सत्ता ।
मैं चेतना हूँ ।
शुद्ध चेतना हूँ ।
मैं अविनाशी हूँ ।
मेरा स्वभाव है - 'होना' ।
मैं 'हूँ' ।

-नामालूम

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