Sunday, March 10, 2019

अंधी बस्ती में इक अजूबा हूँ

अंधी बस्ती में इक अजूबा हूँ
आँख रखता हूँ और गूँगा हूँ

दिन तमाशाई मुझ को क्या जाने
मेरी रातों से पूछ कैसा हूँ

रंग-ए-दुनिया भी इक तमाशा है
अपने हाथों में इक खिलौना हूँ

मेरी मशअ'ल से रात पिघली थी
सुब्ह तिनका सा मैं ही बहता हूँ

क्या ये दुनिया ही चाह-ए-बाबुल है
आदमी हूँ या मैं फ़रिश्ता हूँ

ख़ुद को पाने की क्या सबील करूँ
मैं इन्ही रास्तों में खोया हूँ

(सबील = मार्ग, रास्ता, उपाय, यत्न, तदबीर, पद्धति, शैली)

-मोहम्मद असदुल्लाह

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